ज्वलंत ख़बर : भाषा पर भी बंदिश लगायी जाए ये कहा तक ठीक है. जी है, ऐसा हुआ है कही ओर नहीं अपने ही देश भारत में. मैं इतिहास की बात नहीं कर रहा, मैं बात कर रहा हूँ मॉडर्न भारत की. जहाँ मुसलमान होने पर रोक दिया गया पढ़ने-पढ़ाने पर.
राजस्थान में जयपुर के रहने वाले फिरोज खान को बनारस पहुंच कर ये आभास हुआ कि उसने जिस लगन और प्रेम से जिस विषय को पढ़ा और जिस के बदौलत वो जयपुर से बनारस तक पहुंचे, वो दरअसल उनके लिए नहीं है क्योंकि वो एक मुसलमान हैं.
फिरोज खान की नियुक्ति बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में हूँ, उनकी नियुक्ति गत सात नवंबर को बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के साहित्य विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के तौर पर हुई है, जहाँ कुछ छात्रों ने इस बात पर आपत्ति जताई कि एक मुसलमान संस्कृत कैसे पढ़ा सकता है? विश्वविद्यालय ने तो इस आपत्ति को खारिज कर दिया लेकिन छात्रों का विरोध जारी रहा. कुछ छात्र इस संकाय में गैर हिन्दू की नियुक्ति के विरोध में आ गए और तब से लेकर अब तक लगातार धरना प्रदर्शन जारी है.
वही विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर राकेश भटनागर का कहना है कि नियुक्ति यूजीसी के नियमों के तहत हुई है इसलिए यह विरोध ठीक नहीं है. वीसी ने प्रदर्शनकारी छात्रों से मुलाकात भी की लेकिन छात्रों ने पिछले 12 दिन से पूरे परिसर में पढ़ाई लिखाई बाधित कर रखा है.
विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे शोध छात्र चक्रपाणि ओझा ने कहा, “यह विरोध फिरोज खान का नहीं, बल्कि धर्म विज्ञान फैकल्टी में एक गैर हिंदू की नियुक्ति का है. अगर यही नियुक्ति विश्वविद्यालय के किसी अन्य फैकल्टी में संस्कृत अध्यापक के रूप में होती तो विरोध नहीं होता. आखिर हिन्दू धर्म के बारे में किसी दूसरे धर्म का व्यक्ति कैसे पढ़ा सकेगा.”
वही फिरोज खान का कहना हैं कि उनकी परवरिश ऐसे माहौल में हुई है जहां उन्होंने हिन्दू धर्म और शास्त्र को आम हिन्दुओं की तरह ही बेहद करीब से देखा है. फिरोज खान ने कहा, “मेरे पिता रमजान खान ने संस्कृत में शास्त्री की उपाधि ली है. मेरे दादा जी भी संस्कृत पढ़े थे. मैंने भी बचपन से संस्कृत पढ़ना शुरू किया और उसी विषय में यूजीसी से फेलोशिप मिल रही है. कभी भी मुस्लिम होने के नाते मुझे कोई परेशानी नहीं हुई. लेकिन नियुक्ति को लेकर चल रहे आंदोलन से मैं हैरान हूं.”
बीएचयू प्रशासन ने तो फिरोज खान की नियुक्ति को नियमानुसार बताकर विरोध प्रदर्शन को औचित्यहीन करार दिया है. विश्वविद्यालय के कई अध्यापक भी इस विरोध प्रदर्शन को सही नहीं मान रहे हैं. जबकि प्रदर्शनकारी छात्र कई अध्यापकों के समर्थन का भी दावा कर रहे हैं.
फिरोज खान ने बताया कि मेरी नियुक्ति के बाद मेरे घर वाले खुशी से झूम उठे थे लेकिन अब उन्हें बहुत पीड़ा हो रही है. वो कहते हैं, “क्या मैं सिर्फ इसलिए संस्कृत नहीं पढ़ा सकता कि मैं मुसलमान हूं? जहां तक मुझे मालूम है, महामना मदन मोहन मालवीय जी तो ऐसा कभी ना होने देते.”
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में संस्कृत विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर मोहम्मद शरीफ कहते हैं कि वो पिछले ढाई दशक से इस यहां पढ़ा रहे हैं और उनके छात्रों में हिन्दू और मुसलमान दोनों ही होते हैं. मोहम्मद शरीफ कहते हैं कि उन्होंने खुद इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रोफेसर नसरीन नाम की महिला प्राध्यापक से शिक्षा ली है. प्रोफेसर शरीफ की पत्नी भी संस्कृत की प्रोफेसर हैं.
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में ही संस्कृत विभागाध्यक्ष रह चुके डॉक्टर खालिद बिन यूसुफ तो संस्कृत के ख्यातिप्राप्त विद्वान हैं. यूसुफ कहते हैं, “भारत की सांस्कृतिक विरासत को समझने के लिए संस्कृत मूल स्रोत है. यही कारण है कि कई मुस्लिम छात्र भी इसे पढ़ते हैं. कुछ विषय के तौर पर और कुछ जानकारी के लिए. एएमयू में तो संस्कृत विभाग में आधे छात्र मुस्लिम होते हैं. मेरे कई मुस्लिम छात्र तमाम विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में पढ़ा रहे हैं.”
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्रों का ये प्रदर्शन निंदनीय है. किसी भी भाषा को धर्म विशेष से जोड़ कर चिह्नित नहीं करना चाहिए. ये भाषा का अपमान है. आप इतिहास के पन्नों को पलट कर देख ले, ऐसे अनगिनत हिन्दू और अन्य गैर मुस्लिम लोग हैं जिन्होंने उर्दू भाषा में ख्याति अर्जित की है. फिराक गोरखपुरी से लेकर गोपीचंद नारंग तक इसकी एक लंबी परंपरा रही है जो आज भी जारी है. – क़ायम साबरी