-अभिषेक कुमार

राजग में लंबी खींचातानी के बाद आखिरकार रालोसपा अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने महागठबंधन का दामन थाम लिया। हालांकि उपेंद्र कुशवाहा ने अवसरवादी राजनीति की ओर मुख मोड़ा है। लेकिन आज की राजनीति में यह कोई अनोखा काम नहीं है। उपेंद्र कुशवाहा इस प्रकार की राजनीति के पहले खिलाड़ी नहीं है। उन्होंने अपने इस कदम से आगामी लोकसभा चुनाव में अवसरवाद की राजनीति का शंखनाद कर दिया है। अब चूंकि उपेंद्र कुशवाहा ने राजग का साथ छोड़ दिया है, और महागठबंधन का दामन थामा है, तो उपेंद्र कुशवाहा के राजनीतिक लाभ को भी जानना आवश्यक है। उपेंद्र कुशवाहा को 2014 के लोकसभा चुनावों में राजग में 3 सीटें मिली थी, मोदी लहर में वर्ष भर पुरानी रालोसपा ने उन तीनों सीटों पर विजय हासिल किया और कुशवाहा कोटे से मानव संसाधन विभाग में राज्यमंत्री भी बने। रालोसपा को बनाने में जहानाबाद सांसद डॉ अरूण कुमार एवं उपेंद्र कुशवाहा ने साथ मिलकर अहम भूमिका निभाई थी। हालांकि वर्ष भर बाद 2015 के विधानसभा चुनाव आते-आते उपेंद्र कुशवाहा और डॉ अरूण कुमार के बीच सीट बंटवारे को लेकर अनबन ने सुर्खियों में रफ्तार पकड़ी और वर्ष 2016 की पहली तिमाही के अंदर ही रालोसपा दो भागों में बंट गई। उपेंद्र कुशवाहा इसके बाद 2 सांसद, 1 विधायक और 1 विधान परिषद के साथ रालोसपा के कर्ताधर्ता बनकर उभरे। राजग में मंत्री पद का लाभ भी उठाया और रालोसपा को नई शक्ल देने की भी कोशिश की। अब चूंकि 2019 लोकसभा चुनावों का वक्त नजदीक आ रहा था। उपेंद्र कुशवाहा राजग में बीजेपी के पुराने दोस्त नीतीश कुमार के आ जाने से अपने सीटों को लेकर असुरक्षित नजर आने लगे। राजनीति बयार को भांपते हुए 4 पार्टियों के बीच अपनी स्थिति डावांडोल नजर आते ही कुशवाहा अलग खीर बनाने लगे। उसी वक्त नीतीश कुमार ने सीटों के मामले में पुराने यार से अपनी जिद मनवा ही ली। उपेंद्र कुशवाहा को अपनी स्थिति पर खतरा नजर आने लगा और उन्होंने राजग में आवाज उठाई, मगर भाजपा तक उनकी आवाज नहीं पहुंच पाई और दुःखी मन से उन्होंने राजग का साथ छोड़ दिया।

राजग के अंदर उपेंद्र कुशवाहा 5 सीटें की मांग कर रहे थे। हालांकि 2014 लोकसभा चुनावों में और इस बार के आगामी लोकसभा चुनावों से पूर्व रालोसपा की बदली राजनीति और अंदर खाने में पड़ी फूंट ने उपेंद्र कुशवाहा के मोलभाव में कमी ला दी। 2014 के समय रालोसपा में डॉ अरूण कुमार और उपेंद्र कुशवाहा की जोड़ी की वजह से अगड़ों-पिछड़ों का मजबूत समीकरण तैयार हुआ था। दूसरी तरफ भाजपा नीतीश कुमार के कुर्मी-कोइरी वोट-बैंक में सेंध लगाने का विकल्प उपेंद्र कुशवाहा में देख रही थी। इसलिए रालोसपा मजबूत स्थिति में अपनी मांगें मनवाने में सफल रहा था। इस बार भाजपा को उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के अंदर कलह, टूट, अगड़ों से दूरी दिखाई पड़ी एवं नीतीश कुमार के आने से कुर्मी-कोइरी वोट-बैंक वापस मजबूत होता दिखाई दिया। इसलिए भाजपा ने उपेंद्र को 2 सीटों से संतोष करने का विकल्प दिया। परन्तु उपेंद्र कुशवाहा की मांगों ने राजग को उनसे मुंह मोड़ने का मौका दे दिया, और नतीजा आज सामने है।

बिहार महागठबंधन में दलों की एंट्री को अभी बंद नहीं किया गया है। इसलिए उपेंद्र कुशवाहा ने अपनी राह इस ओर की। कांग्रेस के बुलावे पर महागठाबंधन में शामिल हुए उपेंद्र कुशवाहा ने यूपीए महागठबंधन से भी वही उम्मीदें की हैं, जो हफ्ते भर पहले राजग से थी। सूत्रों के अनुसार महागठबंधन ने भी अपने सीटों का फार्मूला तय कर लिया है। उपेंद्र कुशवाहा 4 सीटों पर मान गए हैं। महागठबंधन सीट शेयरिंग में राजद 18, कांग्रेस 10, रालोसपा 4, हम 2, लोजद 2, राकंपा 2, भाकपा 2 हो सकती है। इस तरह उपेंद्र कुशवाहा का महागठबंधन से जुड़ना फायदेमंद रह सकता है। लेकिन महागठबंधन को उपेंद्र कुशवाहा क्या फायदा दिलाते हैं वो तो 4 महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनाव में ही पता चल पायेगा।