– जसवंत कुमार

आज धर्म, समाज, राजनीति, साहित्य, कला, संस्कृति आदि का भी कोई कोना ऐसा नहीं बचा जहॉ भ्रष्टाचार के कदम न पहुँच पाए हों। प्रत्येक स्तर पर और अनेक रूपों में भ्रष्टाचार का विस्तार हो चुका है, और निरन्तर होता जा रहा है। सरकार और सरकारी प्रतिष्ठानों, जन सेवा से सबंधित प्रतिष्ठानों का तो सीधा-साधा अर्थ ही भ्रष्टाचार का संवैधानिक अड्डा है। सारी व्यवस्था ही लेन-देन पर अाधारित पूर्णतया कलियुग से प्रभावित होकर रह गई है, । अर्थात्, एक हाथ से रिश्वत तो दूसरे हाथ से अपना काम करवा लो। छोटा बड़ा कोई भी कार्य इसके बिना होना संभव नहीं रह गया है। जनता से सीधे सम्पर्क रखने वाले सरकारी, अर्द्ध सरकारी, जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के संस्थान सभी जगह भ्रष्टाचार अाराम से पॉव फैलाए हुए हैं। उसके चरणों में भेंट-पूजा अर्थात् दस्तूरी चढ़ाते जाइये,काम बनने का आशा होने लगेगी। बिना दस्तूरी या फूल-पत्र चढ़ाए कोई फाइल तो क्या पता भी एक से दूसरी मेज तक नहीं सरक सकती।

भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा है राजनीति

आज जो इतना ताम-झाम फैलाकर मंहगे चुनाव लड़े जाते है, किसी समान्य सी धार्मिक या स्वाभाविक संस्था तक का चुनाव-लड़ने में व्यक्ति पागल की तरह प्रयास करता है, वह इसीलिए कि उसे व्यापक स्तर पर भ्रष्टाचार कर सकने का एक प्रकार से लायसेन्स प्राप्त हो जाता है । यहॉ तक की सड़के बनती नहीं, कुएँ खुदते नहीं, हैंडपम्प लगते नहीं, कोई उपकरण खरीदी तक नहीं जाती पर लाखों-करोड़ों के बिल पास होकर भुगतान भी हो जाता है । जब तक ऐसा करने वालों का पता चल पाता है तब तक व्यवस्था बदल चुकी होती है।

आम आदमी के सपने पर भ्रष्टाचार का डाका

इसे आप एक कमाल ही कह सकते है कि भारतीय इंजीनियर बिना नींव खोदे ही कई-कई मंज़िलों वाले मकान खड़े कर देते है, वह भी बिना सिमेन्ट के मात्र रेत से। यह भारत ही है जहॉ कागज़ों पर जंगल उगा दिये जाते है, हज़ारों कुएँ तक खोदे जाते हैं । बिना रिश्वत आपके घर के नल में पानी की एक बूंद नहीं टपक सकती घर में रोशनी नहीं तक नहीं आ सकती। किसी का सारी जमा-पूंजी लगाकर बनाया घर भूमिसात हो जाती है । पीड़ित और अराजक तत्वों द्वारा सब कुछ लूट कर संत्रस्त किए जाने पर भी आप थाने में तब तक रिपोर्ट नहीं लिखवा सकते जब तक कि लिखने वाले की मुट्ठी न गरम कर दें। न्यायाधीश के बगल में बैठ कर उसका पेशकार रिश्वत ले रहा है, पर रिश्वत के विरूद्ध निर्णय सुना रहे न्यायाधीश महोदय की दृष्टि उधर भूल कर भी नहीं जाती।

सरकारी तंत्रों में भ्रष्टाचार का घर

हिंसक, असामाजिक, और अराजक तत्व खुले आम मनमानी करते फिर रहे है, ट्रक के ट्रक अवैध माल पार कर ले जाने वाले को कोई पूछता तक नहीं पर किलो भर वस्तु घर के लिए ज्यों-त्यो करके ले जानेवाला ब्लैक के नाम पर पकड़े जाते हैं । इस प्रकार वास्तव में चारों ओर भ्रष्टाचार का राज है। उनके बल पर छोटा बड़ा कोई भी काम करवा लीजिए, रिश्वत लेते पकड़े जाने पर रिश्वत देकर छूट जाइये, पर सामान्य ढ़ंग से छोटे से छोटे काम करवा पाना सम्भव नहीं । हमारे देश में तो मंत्री तक भ्रष्टाचार से घिरे हुए है।

छात्र
कॉलेज ऑफ कॉमर्स पटना