सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के लिए राहुल गांधी को बतौर अध्यक्ष चुन लिया गया। पार्टी की कमान पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी के 19 साल के कार्यकाल से होती हुई उनके बेटे राहुल गांधी की झोली में आ गिरी, जो कि आज नहीं तो कल होना ही था। मसलन, एक बात तो साफ है कि राहुल गांधी का निर्विरोध चुना जाना पार्टी की परंपरागत वंशवाद की राजनीति को दर्शाता है। पीढ़ी दर पीढ़ी राहुल गांधी अपने परिवार के ऐसे 5वें सदस्य होंगे जो पार्टी की बागडोर संभालेंगे।

विडंमना ये है कि लोकतंत्र जिनके कंधो पर सवार होता है उन सियासी पार्टियों के इन चुनाव की खास बात है ये है कि ये कहीं से चुनाव ही नहीं है तो क्या मान लिया जाए कि लोकतंत्र के भीतर ही लोकतंत्र खोखला हो चला है? अलबत्ता, अगर विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश से ही अगर लोकतंत्र गायब होने लगे तो तो इसे लोकतंत्र की त्रासदी नहीं तो और क्या समझा जाए। बहराल, अगर इतिहास के पन्नों को टटोला जाए तो मेरे हिसाब से इंदिरा गांधी के बाद से कोई भी कांग्रेस की रुप रेखा सही ढंग से गढ़ नहीं पाया। मसलन, देश की मौजूदा सियासत में कांग्रेस हाशिए पर आ खड़ी है इस बात से भी गुरेज नहीं किया जा सकता।

अब ऐसे में विचारनीय है कि क्या राहुल गांधी अपनी वंशवाद की परपाटी को भेदते हुए पार्टी को नए मुकाम पर ले जा पाएंगे? , या फिर हालात जस के तस रहेंगे? अब गौरतलब होगा कि कांग्रेस के नए नवेले अध्यक्ष राहुल गांधी 21वी सदी के भारत की दिशा और दशा कैसे तय करते हैं।