अनुज अवस्थी, नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिवसीय चीन के दौरे पर हैं। पीएम मोदी की इस यात्रा को लेकर तमाम बुद्धजीवी अलग-अलग प्रकार के कयास लगा रहे हैं। हमें समझना होगा कि भारत और चीन की इस अनौपचारिक समिट के आखिर मायने क्या हैं? दोनों देशों के बीच ये किस प्रकार की सन्धि की बात की जा रही है? या फिर ये एक पहल के नाम पर सिर्फ जुमला है।

क्योंकि देश के बुद्धिजीवी इस दोस्ती की पहल को मेड-इन-चाइना की संज्ञा दे रहे हैं। और ये कोई पहली बार नहीं है जब दोनों देशो के बीच विवाद को लेकर गहमागहमी कम करने की कवायत की जा रही हो। ऐसा माहौल पहले भी बनाया गया। लेकिन परिणाम वही ‘ ढाक के तीन पात ‘ चीन ने हर बार भारत के दोस्ती वाले फरमान को दरकिनार कर अपनी ओछी मानसिकता को दर्शाया है इस बात से गुरेज नहीं किया जा सकता है। पीएम मोदी की इस अनौपचारिक यात्रा को लेकर कयास लगाना लाजमी हैं।

क्योंकि भारत और चीन के बीच में डोकलाम विवाद, मसूद अजहर को आतंकी घोषित करवाना, एनएसजी ग्रुप की सदस्यता के लिये हामी भरवाना, इन सभी मुद्दों को लेकर दोनों देशों के बीच में तनातनी जारी है। तो क्या प्रधानमंत्री मोदी चीन को उन सभी मुद्दों पर राजी करा पाएंगे? अगर चीन इन सभी मुद्दों को लेकर सहमति व्यक्त कर भी देता है फिर भी चीन की इस मेड-इन-चाइना वाली दोस्ती कितने दिनों तक कारगर साबित होगी कहना मुश्किल है। दोनों देशों की इस अनौपचारिक समिट पर पाकिस्तान भी टकटकी लगाकर देख रहा है।

क्योंकि अगर भारत और चीन के रिश्तों में जरा भी सुधार होता है तो इससे सबसे ज्यादा परेशानी नापाक इरादों वाले पाकिस्तान को ही होगी। क्योंकि एक चीन ही ऐसा मुल्क है जो आतंकवाद से लेकर हर अवैध गतिविध में पाकिस्तान को सह देता आया है।

बहराल, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने जिस गर्मजोशी के साथ पीएम मोदी का स्वागत किया उससे चीन की ओर से एक सकारात्मक पहल की उम्मीद लगाई जा सकती है। अब ये उम्मीद किस हद तक सफल होती है इस बता का पता तो मोदी की भारत वापसी के बाद ही चल पाएगा।