देश में सत्ताधारी पार्टी पर सवाल उठाते हुए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी सिंगापुर में लोगों के साथ मुखातिब क्या हुए भारतीय राजनीति में मानो खलबली मच गयी। तमाम भारतीय मीडिया के चैनल इस अलग-अलग तरीके से पेश करने में जुट गए। हद तो तब हो गई जब भारतीय जनता पार्टी के कुछ तथाकथित नेता ये कहते हुए नजर आए कि देश की कमजोरी को बाहर बताना बेहद ही चिंता का विषय है। वाकई हंसी आती है राजनेताओं के ऐसे वक्तव्यों को सुनकर। एक तरफ भाजपा देश को मजबूत बताते-बताते नहीं थकती तो दूसरी तरफ उनके ही नेता देश की कमजोरियों का बखान कर रहे हैं। वाकई लोकतंत्र खतरे में है इसका अंदाजा भी हो गया।

कहा जाता है कि कोई भी देश विकास के पथ पर तेजी से तब बढ़ता है जब उस देश का विपक्ष मजबूत हो, वैसे तो मौजूदा वक्त में कांग्रेस को बतौर विपक्ष मजबूत बताना बेमानी होगी, पर जब  विपक्ष अपनी मजबूती को लेकर संजीदगी प्रकट करता है तो देश की मुख्य धारा की मीडिया जो की सरकार की दरबारी हो चली है पीनी पी-पीकर विपक्ष की अलोचना करने को आतुर दिखाई देती है। बहराल, राहुल गांधी ने जो भी देश मौजूदा खस्ता हालत के बारे में कहा ये उन्हें क्या इसलिए नहीं कहना चाहिए था क्योंकि वो विदेश में थे। वाकई ये तर्क बेहद ही हस्यासपद है जो कि देश के कुछ तथाकथित विद्वानों द्वारा कहा जा रहा है।

अब जब राहुल गांधी ने इस परिपेक्ष्य में आवाज उठाई है तो देश की मुख्यधारा की मीडिया और बुद्धजीवी लोगों को तर्क के साथ सच्चाई को स्वीकारना चाहिये न कि कुतर्क कर देश को घटिया राजनीति की जद में धकेलना चाहिए। और वैसे भी हम एक ऐसे लोकतांत्रिक देश में रहते हैं जहां पर हर नागरिक को शांति पूर्वक अपने हक के लिए आवाज उठाने का हक है। अब ऐसे में सवाल उठता है कि अगर हमारा संविधान हमें अपनी अवाज उठाने का हक प्रदान करता है तो फिर ये उन्माद क्यो ? दरअसल सत्तारुड़ दल राहुल गांधी के इस वीडियो को लेकर इतना हल्ला इसलिये मचा रहा है ताकि जो देश मे बेहद ही मुख्य मुद्दे उठ रहे हैं उन्हें किसी भी तरह दबाया जा सके, अब इसे तानाशाही नहीं तो और क्या समझा जाए। भाजपा और कांग्रेस की विचारधारा की लड़ाई हो सकती है और होनी भी चाहिए, लेकिन देश का मजबूर और वेबस युवा रोजगार की आस में सरकार की और टकटकी लगाकर देख रहा है, देश का किसान कर्ज माफी से लेकर अपनी फसल की जायज कीमतों को लेकर सरकार के भरोसे है, उधर देश की महिलायें अपनी सुरक्षा जैसे मुद्दों से जूझ रहीं है, क्या इन सभी मुद्दों को किसी भी विदेश या फिर देश में उठाना गलत बात है ?  मेरे हिसाब से तो नहीं। जिस सरकार को देश की 125 करोड़ आवाम ने वोट देकर अपनी सरआंखों पर बैठया, सरकार को उनके हित के बारे में सोचना चाहिए, नहीं तो ये आवाज लगातार और बार-बार उठती रहेगी।