तमाम सियासी उठा पटक के बाद गुजरात में आखिरकार भाजपा अपने मंसूबों में कामयाब हो ही गई। परम्परागत तौर पर 6ठी बार नरेंद्र मोदी ने 99 सीटों के साथ गुजरात में अपनी जीत का परचम लहराया। इसके साथ ही कांग्रेस खेमे में एक बार फिर से मायूसी छा गई।
गौरतलब हो कि प्रधानमंत्री मोदी संसदीय सत्र जैसे कई सरकारी कामकाज छोड़ कर पूरे चुनाव के दौरान गुजरात की रणभेरी भरते रहे। विचारनीय है, कि उत्तर प्रदेश के बाद यह दूसरा राज्य हैं जहां मोदी ने पूरे दमखम के साथ सत्ता के लिए संघर्ष किया। तो ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मोदी के चहरे के बिना भाजपा का जीतना असंभव है? क्या इन दिनों मोदी का मतलब ही भाजपा हो चला है? अगर हां तो क्या मोदी बतौर पीएम बस भाजपा का प्रचार ही करते रहेंगे?
ऐसा इसलिए क्योंकि आगामी वर्ष यानि कि 2018 में देश के तकरीबन 8 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। अलबत्ता, इनमें तमाम राज्य ऐसे भी हैं जहां पर बीजेपी की शाख दाव पर लगी होगी। तो क्या उस समय भी मोदी दिल्ली की गद्दी और अपनी तमाम जिम्मेदारियों को दरकिनार करते हुए सत्ता के लालच के लिए सियासी रण में कूद पड़ेंगे? अगर हां तो ऐसे में सवाल उठता है कि, क्या वाकई मोदी के ऊपर विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के प्रधानमंत्री होने की जिम्मेदारी है? अलबत्ता, अगर प्रधानसेवक के मौजूदा दौर के कामकाजों को टटोला जाए तो वो प्रधानसेवक कम प्रचारसेवक ज्यादा समझ में आते है। बहराल, उन 8 राज्यों के चुनाव के लिए मोदी किस तरह से सत्ता का स्वाद चखने के लिए चुनावी जंग का हिस्सा बनेंगे, मेरे हिसाब से ये अभी कहना जल्दबाजी होगी।
उम्मीद करता हूं कि गुजरात की चुनावी रैलियों की थकावट जो प्रधानसेवक को हुई होगी वो अब तक उतर चुकी होगी। तो अब उन्हें तत्काल रुप से अपनी जिम्मेदारियों की और लोटना चाहिए, और उन्हें व्यापक स्तर पर अपने किए हुए वादों पर काम करना चाहिए। नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब उन्हें जनतंत्र के आक्रोश का सामना करना पड़े। और सत्ता से बेदखल होना पड़े। उम्मीद करता हूं की प्रधानमंत्री मोदी को रामधारी सिंह दिनकर की ये पंक्तियां जरुर याद होंगी, सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।
ये लेखक के अपने विचार हैं ।