-अभिषेक कुमार
30 साल पहले 25 अक्टूबर 1988 को दिल्ली के वोट क्लब में भारतीय किसान यूनियन के संस्थापक महेंद्र सिंह टिकैत ने राजीव गांधी के शासनकाल में सात दिनों तक किसानों की मांगों को लेकर प्रदर्शन किया था। भारत की आजादी के बाद किसानों का यह पहला बड़ा आंदोलन था। महेंद्र सिंह टिकैत ने दिल्ली मे करीबन 5 लाख किसानों की भीड़ उनकी मांगों को लेकर जुटाई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार को भी इतने बड़े आंदोलन का अंदेशा न था, आखिरकार सात दिनों के बाद उन्होंने किसानों की मांगों को मानने पर सहमति जताई थी। 30 वर्ष बाद उसी भारतीय किसान यूनियन ने किसानों की 15 सूत्री मांगों को लेकर अध्यक्ष नरेश टिकैत (महेंद्र सिंह टिकैत के बेटे) के नेतृत्व में किसान आंदोलन का बिगुल फुंकते हुए दिल्ली में प्रवेश का प्रयास किया, और पुलिस ने उनका स्वागत लाठी, डंडे बरसा कर किया। उन्हें दिल्ली में जब प्रवेश नहीं करने दिया गया। तब वहीं किसानों ने अपना प्रदर्शन आरंभ किया। हालांकि मौजूदा मोदी सरकार ने इस पर त्वरित प्रतिक्रया दी और किसानों के इस आंदोलन को व्यापक रूप धारण करने से पूर्व उनकी 15 मांगों में से 7 मांगों को मानकर किसान आंदोलन पर फिलहाल के लिए विराम लगा दिया।
विभिन्न राज्यों से 70 हजार किसान दिल्ली आये
भारतीय किसान यूनियन ने 23 सितंबर को हरिद्वार से अपना आंदोलन शुरू किया। किसान आंदोलन को धार देने और सरकार तक अपनी आवाज पहुंचाने के लिए 02 अक्टूबर यानि महात्मा गांधी की जंयती का दिन चुना गया। मगर गांधी गुणगान में व्यस्त रहने वाली सरकार को किसानों के नारों की आवाज अच्छी नहीं लगी। सरकार ने अपनी पुलिसिया जोर का सहारा लेकर लाचार, बेबस, गरीब किसानों पर लाठियां बरसाने का आदेश दिया। महात्मा गांधी के इस भारत भूमि पर उन किसानों की बात नहीं सुनी गई जिसकी एक पुकार पर भारत में पहली बार गांधी ने भी आंदोलन की शुरूआत की थी। महात्मा गांधी ने आजादी के बाद किसानों के लिए राजनीतिक सत्ता के साथ हर किस्म की सत्ता में भागीदारी की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि, ‘किसानों के पास यदि केवल जमीन होगी सत्ता नहीं होगी तो उनकी स्थिति खराब हो जायेगी।’ आज उनकी कही बात सत्य में चरितार्थ हो रही है। उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और अन्य दूसरे राज्यों से 70 हजार के करीब आये भारतीय किसानों ने सरकार से अपनी मांगों को लेकर गुहार लगाने देश की राजधानी 8 दिनों के सफर के बाद पहुंचे। किसानों की दुर्दशा बद से बदत्तर हो गई है। देश में कुल आत्महत्याओं का 11.2 प्रतिशत आत्महत्या किसान कर रहे हैं। अपनी इसी स्थिति को सुधारने की इच्छा से दिल्ली आए भारतीय किसान यूनियन ने सरकार के समक्ष अपनी 15 मांगें रखी।
भारतीय किसान यूनियन के द्वारा की गई 15 मांगें :-
1. डॉ स्वामीनाथन द्वारा पेश की गई रिपोर्ट के आधार पर बी2 फार्मुले के अनुसार न्यूनतम समर्थन मूल्य को वैधानिक दर्जा देते हुए किसानों की सभी फसलों पर लाभकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य के साथ उस पर कम से कम 50 प्रतिशत समर्थन मूल्य घोषित किया जाए। मंडी में गुणवत्ता मापदंड के उत्पादन का भाव किसी भी समर्थन मूल्य से कम न हो। ऐसा होने पर दंड का प्रावधान किया जाए।
2. देश के किसानों के सभी तरह के कर्ज एक ही समय सीमा में माफ कर दिये जायें। देश में लगभग 80 प्रतिशत कर्ज राष्ट्रीयकृत बैंकों का है। इस कर्ज माफी में साहूकारों, सहकारी बैंक द्वार लिया गया ऋण भी शामिल है। किसान क्रेडिट कार्ड योजना के अंतर्गत आने वाले बजट सत्र में चार वर्ष तक केवल ब्याज जमा करने व पांचवें वर्ष नवीनीकरण के समय मूलधन ब्याज सहित जमा कराने का प्रावधान किया जाए।
3. राष्ट्रीय प्र्राधिकरण द्वारा लगाए गए 10 साल से अधिक प्रयोग में लाए गए डीजल वाहनों पर लगी रोक में किसानों के वाहनों (ट्रैक्टर, कृषि कार्य में प्रयोग होने वाले डीजल वाहनों) पर से रोक हटा दिया जाए। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के आसपास के क्षेत्र में इनके प्रयोग पर रोक लगी है।
4. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में सरकारों का सीधा हस्तक्षेप हो, क्योंकि बीमा कंपनियां केवल अपना मुनाफा कमा रही है। किसानों को मिलने वाला लाभ बीमा कंपनियों को मिल रहा है। किसानों को लाभ देने के लिए सात दिन की समय सीमा तय की जाए। साथ ही योजना में बदलाव करते हुए किसानों को ईकाई मानकर स्वैच्छिक रूप से फैसले लेने को लागू किया जाए एवं योजना में चोरी, आगजनी को भी शामिल किया जाए। प्रीमियम का पूर्ण भुगतान सरकार द्वारा किया जाए।
5. किसानों को पेंशन भी मुहैया कराया जाए। 60 वर्ष से अधिक उम्र होने पर लघु एवं सीमान्त किसानों को 5000 रुपये का मासिक पेंशन दिया जाए। साथ ही किसानों की न्यूनतम आमदनी तय की जाए।
6. किसानों का बकाया गन्ने की राशि का भुगतान ब्याज सहित फौरन चुकाया जाए। चीनी का न्यूनतम मूल्य 40 रुपये किलो तय किया जाए।
7 . देश के कुछ राज्यों में अन्ना प्रथा पर रोक लगाई जाए। किसानों के फसलों को जंगली सुअर, नीलघोड़ा जैसे जानवर नष्ट कर देते हैं। इनसे देश की कृषि और कृषकों के साथ खाद्य सुरक्षा को भी खतरा है इस पर वृहत रूप से विचार करके कोई ठोस योजना बनाई जाए।
8. देश में कृषि में पिछड़ेपन के कारण पिछले दस वर्षों में सरकारी रिकार्ड के अनुसार 3 लाख से अधिक किसानों ने आत्महत्या की है। उनके परिवारों को पुर्नवास कराते हुए परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाए।
9. देश में पर्याप्त मात्रा में पैदा की गई फसलों का आयात बंद कर दिया जाए। आसियान मुक्त व्यापार समझौते की आड़ में कई देश ऐसी वस्तुओं का आयात कर रहे हैं। जिसके वह उत्पादक नहीं है।
10. देश में सभी जमीन से जुड़े मामले भूमि अधिग्रहण एवं पुर्नवास अधिनियम 2013 द्वारा ही हल किये जाएं, भूमि अधिग्रहण को केंद्रीय सूची में रखते हुए राज्यों को किसान विरोधी कानून बनाने से रोका जाए।
11. कृषि में उपयोग आने वाली सभी वस्तुओं को जीएसटी के दायरे से हटा दिया जाए।
12. किसानों को सिंचाई के लिए नलकूप की बिजली निःशुल्क उपलब्ध कराई जाये।
13. कृषि को विश्व व्यापार संगठन से अलग रखा जाए। मुक्त व्यापार समझौते में कृषि पर चर्चा न की जाए।
14. देश में सरकारी योजना मनरेगा को खेती से जोड़ा जाए।
15. किसानों के मुद्दे पर सदन की संयुक्त अधिवेशन बुलाकर एक माह तक चर्चा की जाए।
सरकार ने किसानों की सुनी 7 मांगें
किसानों के प्रदर्शन को लेकर बढ़ती खबरों व राजनीति पर सरकार ने फौरन अंकुश लगाने के लिए केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को कमान सौंपी गई। उन्होंने किसानों के पास जाकर उनकी मांगों पर सरकार का पक्ष रखते हुए उनकी 7 मांगों को मानने का फैसला लिया। लेकिन जो मांगें नहीं मानी गई उनमें किसानों को दिया जाने वाला पेंशन की मांग, गन्ना की राशि का ब्याज सहित भुगतान, किसानों के मुद्दे पर संसद का संयुक्त सत्र बुलाना, भूमि अधिग्रहण में भूमि अधिग्रहण एवं पुर्नवास योजना 2013 को मानना, किसानों के परिवार को नौकरी प्रदान करना, कृषि को विश्व व्यापार संगठन से अलग करने जैसे मसले रहे। जिस पर सरकार ने अपनी चुप्पी साध ली।
सरकार द्वारा मानी गई 7 मांगें : –
1. अभी तक खरीफ फसल पर यह रकम दी जाती थी, 3 दिन के अंदर यह राशि रबी फसल पर भी मिलना शुरू करा दिया जायेगा। सरकार इसकी जिम्मेदारी लेती है। एमएसपी पर राज्य सरकारों द्वारा केंद्र सरकार की ओर से एडवाइजरी जारी करा दिया जायेगा कि किसानों को फसल का उचित दाम मिलना चाहिए। अभी खरीद एक महीने तक होती है, यूनियन की मांगों के बाद उसकी अवधि 3 महीने तक बढ़ा दी जायेगी।
2. किसानों की कर्ज माफी के संबंध में मेरी अध्यक्षता में कमिटी बनाई जायेगी, जिसमें किसान प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाएगा। अगले तीन महीनों में इसके निस्तारण की कोशिश की जायेगी।
3. डीजल वाहनों पर लगे प्रतिबंध के खिलाफ केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट जायेगी और किसानों की लड़ाई लड़ेगी।
4. बीमा कंपनियां यदि किसानों के भुगतान में समय लगाएगी और यदि 7 दिनों के अंदर भुगतान नहीं करती तो उन्हें 12 फीसदी ब्याज दर से किसानों को भुगतान करना पड़ेगा। फसल बीमा पर अन्य सुझावों पर किसानों के नेताओं के साथ बैठकर चर्चा में सुलझाया जायेगा और उनको लागू किया जायेगा।
5. जंगली पशुओं से फसल नष्ट हो जाने के क्रम में इस नुकसान को फसल बीमा में शामिल किया जाना चाहिए। देश के हर राज्य में खास फसल के समय एक पायलट प्रोजेक्ट तैयार करके इसको लागू करना है। इसकी जांच की जायेगी, जांच के बाद आई रिपोर्ट को हर राज्य में लागू भी किया जायेगा।
6. कृषि में उपयोग होने वाली वस्तुओं को जीएसटी से बाहर रखने के संबंध में जीएसटी काउंसिल में इस मुद्दे को रखवायेंगे। किसानों के हित में जो होगा ज्यादा से ज्यादा उसे करवाने की कोशिश करेंगे।
7. जो फसल भारत में पर्याप्त मात्रा में पैदावार है उसकी आयात पर रोक लगाई जाए सरकार इसको सुनिश्चित करेगी।
किसानों की सभी मांगें जायज नहीं
किसानों की कुछ मांगों को जायज ठहराया जा सकता है पर सभी मांगों को मानना न सिर्फ राजग सरकार के लिए मुमकिन है, बल्कि ये मागें देश के अन्य क्षेत्रों से विरोध और कई प्रकार के आंदोलनों को जन्म दे सकती है। किसानों के पेंशन की मांग करना या किसानों के साथ मजदूरों के लिए नियमित वेतनमान भी जायज नहीं ठहराया जा सकता है। किसानो की कर्ज माफी होना आवश्यक है, पर उनको सस्ते दर कर्ज भी मुहैया कराया जाना चाहिए। वहीं गन्ने की राशि पर भुगतान के साथ चीनी का दाम तय किया जाना, अन्य गन्ने से बनी वस्तुओं को घाटे में डाल सकती है। सिंचाई में निःशुल्क बिजली मुहैया कराने पर भी सरकार का दांव अब तक उल्टा पड़ा है। निजी कंपनियां यहां मुनाफा कमा रही है और सरकार घाटे में जा रही है, वहीं सरकार पर सब्सिडी का बोझ बढ़ने से आम नागरिकों में बिजली दर बढ़ने का डर रहता है। ऐसे में सरकार इस मांग पर मुहर नहीं लगा सकती है। वहीं विश्व व्यापार संगठन से कृषि को अलग रखना और कृषि मुद्दे पर संसद का विशेष सत्र बुलाने जैसी मांग भी सही नहीं कही जा सकती, क्योंकि इससे सरकार पर अधिक दबाव बनेगा और वो कोई जोखिम नहीं उठाना चाहेगी। इसलिए किसानों के भी कई प्रकार की मांगों को सरकार के लिए मानना मुश्किल है।
किसानों की मांगों और हालातों पर होती राजनीति
किसानों के इस देशव्यापी आंदोलन पर राजनीति भी जमकर की जा रही है, एक ओर जहां किसानों पर सरकार की तानाशाही रवैये के खिलाफ माहौल बनाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर विपक्षी दल किसानों के मांगों को जायज ठहरा रही है। लेकिन यदि पिछले तेरह वर्षों में संप्रग सरकार के काल को भी खंगाला जाए तो किसानों के दर्द की कहानी बयां हो जाती है। 2004 के आंकड़ों के अनुसार देश भर में 18,241 किसानों ने आत्महत्या की थी, यह एक वर्ष रहा जहां किसानों ने सबसे अधिक आत्महत्या की थी। वर्ष 2005-2015 तक देश में 1,00,000 किसानों ने की आत्महत्या की, यह दर 1.4 से 1.8 प्रतिशत का दर्ज किया गया। इसमें मोदी सरकार के भी डेढ़ वर्ष शामिल है। सरकारें सिर्फ यहीं दोषी नहीं हैं, केंद्र में जब संप्रग सरकार थी, भाजपा और उनकी सहयोगी पार्टियां किसानों के हितों के मुद्दे पर संसद से सड़क तक टकराव करती रही। भूमि अधिग्रहण, रियल एस्टेट जैसे कानून सदन में हंगामें की भेंट चढ़ते रहे। पहले संप्रग सरकार हो या अब राजग सरकार सभी किसानों की स्थिति को लेकर बनी डॉ स्वामीनाथन रिर्पोट को मानने का वादा तो करते हैं पर उन्हें पूरा नहीं करते।
केंद्र में मोदी सरकार के बनने के बाद राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार तीन वर्षों में 36,332 किसानों ने आत्महत्या की। वर्ष 2014 में 12360, 2015 में 12,602, 2016 में 11,370 किसानों ने आत्महत्या की। 2014 में आत्महत्या करने वाले किसानों में 5,650 किसान और 6,710 खेती से जुड़े मजदूर थे। 2015 में आत्महत्या करने वाले किसानों में 8,007 किसान थे, 4,595 खेतिहर मजदूर शामिल थे। इन तीन वर्षों में 87.5 आत्महत्या करने वाले किसान मात्र सात राज्यों के थे।
मोदी सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना चलाया जिसका लाभ किसानों से अधिक बीमा कंपनियां उठा रही हैं। किसान क्रेडिट कार्ड जैसी योजनाएं भी सरकारी बहिखातों में दर्ज है। लेकिन किसान फिर भी तंगहाली से जीवन जीने को मजबूर है। खरीफ फसलों पर सरकार द्वारा बढ़ाए गए एमएसपी भी किसानों की फटेहाली को ढ़कने में नाकाम हुआ है। किसानों से वादे तो किये जाते हैं, राज्यों के चुनाव के समय हो या आम चुनावों के समय का किया गया वादा हो। 2017 में मुख्यमंत्री बनने से पूर्व योगी आदित्यनाथ ने किसानों से कर्ज माफी का वादा किया, मगर उनका वादा किसानों के पास लालीपॉप की तरह आया। महाराष्ट्र में भी देवेंद्र फड़नवीस सरकार ने 34 हजार करोड़ की कर्ज माफी का वादा किया, मगर वे भी बस 13,580 करोड़ ही महाराष्ट्र किसानो के खाते में पहुंचा सके। जबकि साल 2015 के आकड़ों के अनुसार सिर्फ महाराष्ट्र में 4,291 किसानों ने आत्महत्या किया है।
2018 में किसानों का आंदोलन जोर पकड़ा
वर्ष 2018 के आरंभ से ही किसानों ने अपनी आवाज उठानी शुरू कर दी थी। दिल्ली में पहले तमिलनाडु के किसान अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करते रहे, मगर उनकी सुनने वाला कोई नहीं था। फिर जून की महीने में मध्यप्रदेश से किसान आंदोलन की आवाज उठी। देश के 7 राज्यों के किसानों ने देशव्यापी बंद बुलाया, और देश के 130 किसान सगठनों ने 10 दिनों का बड़ा आंदोलन किया पर सरकार की कानों में जू तक न रेंगी। 5 सितंबर 2018 को दिल्ली में ही किसानो और मजदूरों का बड़ा आंदोलन देखने को मिला। उसमें करीबन 1 लाख 20 हजार के करीब किसान और मजदूर एकजुट हुए थे। 5 सितंबर की रैली में यह फैसला लिया गया कि यदि सरकार उनकी मांग नहीं मानती तो देश में 28, 29, 30 नवंबर को 201 किसान संगठन दिल्ली में वापस प्रदर्शन करेंगे।
सरकार के लिए कड़ा संदेश है किसान आंदोलन
भारतीय किसान यूनियन ने देश में किसानों की आवाज को फिर से उठा दिया है। यह आवाज अब दबने वाली लग नहीं रही है। इसी बार चार राज्यों के विधानसभा चुनाव हैं, उनमें से मध्यप्रदेश, तेलंगाना, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य हैं। मध्यप्रदेश में जहां वर्ष 2015 में 1290 किसानों ने, तेलंगाना में 1400 किसानों ने और छत्तीसगढ़ में 954 किसानों ने आत्महत्या की। वहीं राजस्थान के किसान भी कर्ज में डूबे हैं और अपनी तंगहाली पर आत्महत्या करने को मजबूर हैं। इन चार राज्यों में भाजपा की सरकार है, इसलिए भाजपा के लिए किसान आंदोलन चिंता का सबब बन सकती है। साथ ही 2019 का आम चुनाव भी सिर पर है। ऊपर से नवंबर में पूर्व सुनियोजित किसान और मजदूर आंदोलन भी भाजपा के गले की फांस बन सकती है। लेकिन इसके बावजूद किसानों की मांगों पर अमल करना चुनावों से अधिक महत्वपूर्ण है। क्योंकि देश के लाखों पीड़ित किसान अब अपने हक की आवाज को और दबा हुआ देखना नहीं चाह रहे। भारतीय किसान यूनियन ने ये साबित कर दिया कि देश के किसान महात्मा गांधी के नारे ‘करो या मरो’ की स्थिति में आंदोलन को निकालकर सरकार को बड़ी चेतावनी दे रहे हैं।