-अभिषेक कुमार
लोकसभा चुनावों के बाद कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और त्रिणमूल कांग्रेस ने फैसले लेने का काम किया। कांग्रेस अध्यक्ष ने अपना पदभार छोड़ने की भी पेशकश कर दी। वहीं ममता बनर्जी ने भी मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया, लेकिन ना तो राहुल गांधी और ना ममता बनर्जी के इस्तीफे को उनकी पार्टी ने स्वीकार किया। वहीं आप पार्टी ने अपनी राजनीति को दिल्ली तक सिमटा लेने का निर्णय ले लिया है। राहुल गांधी का फैसला भविष्य में कितना सफल बदलावों में शामिल होता यह तो इस्तीफे की मंजूरी के बाद ही पता चल पाता। मगर ऐसे वक्त में जहां राष्ट्रीय अध्यक्ष की निजी छवि का प्रयोग लगातार चुनाव अभियानों में कुछ वर्षों से किया जा रहा हो और सफलता दूर नजर आती हो तो नए प्रयोगों की ओर देखना लाजिमी हो जाता है। खैर इसे भी एक प्रयोग का दौर कहा जा सकता है। जहां तक संभव है राहुल गांधी इस बार पार्टी के अंदर अपनी नई और आक्रामक छवि को दिखा सकते हैं। कांग्रेस के लिए अहम होगा कि वो नए विकल्पों की ओर देखे, साथ ही युवा और अनुभव का सामंजस्य मिलाकर अपनी टीम तैयार करे। वहीं ममता बनर्जी के किले में भाजपा की सेंधमारी क बाद ममता बनर्जी को भी तुष्टिकरण की राजनीति से बचना होगा, वरना त्रिणमूल कांग्रेस का राजनीतिक नुकसान व्यापक हो सकता है, क्योंकि भाजपा ने यदि लोकसभा चुनावों के प्रदर्शन को दुहराया तो ममता विधानसभा चुनाव हार जायेगी। इसी तरह का खतरा आम आदमी पार्टी को हो सकता है, दिसंबर, 2019 में दिल्ली विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में आम आदमी पार्टी का दिल्ली में ही अपना ध्यान लगाने का फैसला उचित माना जा सकता है, क्योंकि आप का आधार भी दिल्ली तक ही सिमट कर रह गया है। यह आप पार्टी की संगठनात्मक हार के रूप में भी देखा जा सकता है कि आप ने अपना विस्तार करने में नाकामी हासिल की है। बिहार की मुख्य विपक्षी पार्टी राजद का लोकसभा चुनावों में खाता ना खुल पाना पार्टी का खस्तहाल दिखा रही है। लालू प्रसाद यादव की परेशानी दोनों तरफ से नजर आ रही है, एक तो उन्हें जमानत नहीं मिल रही और दूसरी ओर उनकी पार्टी अपना आधार खोती जा रही है। यदि लालू 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों तक बाहर नहीं आ पाते हैं तो फिर राजद के लिए यह शुभसंकेत नहीं रहेगा। एक बात और फिलहाल लालू प्रसाद यादव को भी अपनी पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में बदलाव करना चाहिए। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में लालू प्रसाद नियुक्त हैं, लेकिन राजद को सुचारू ढंग से उनके काम का लाभ मिल नहीं पा रहा है। उन्हें अपने से इत्तर नए विकल्पों पर ध्यान देना होगा।

साथ ही विपक्षी पार्टियों को अपना मोह त्याग कर एक संगठन के रूप में आने वाले विधानसभा चुनावों में प्रदर्शन करना चाहिए। इस वर्ष महाराष्ट्र, दिल्ली, झारखंड जैसे राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इसमें दिल्ली सबसे महत्वपूर्ण रहने वाली है जहां भाजपा की तैयारी सरकार बनाने की होगी और विपक्ष की एकता के नाम पर वहां सभी पार्टियां अलग-थलग पड़ी है। इन मुद्दों के अतिरिक्त विपक्ष को ईवीएम पर वीवीपैट मिलान की लड़ाई भी इसी काल में लड़नी होगी, तभी संभव है कि वो भाजपा के दो-तरफा रूप से घेर सके और विजय हासिल कर पाये।