अनुज अवस्थी, (बैंगलोर): कर्नाटक में होने वाले विधानसभा चुनाव की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आती जा रही है राज्य में राजनीति  दिनों दिन दिशा और दशा बदल रही है। राज्य में चुनावी पारा लगातार चड़ता जा रहा है। सभी राजनैतिक दल लगातार सियासी रोटियां सेकते हुए दिखाई दे रहे हैं। वैसे कहने को तो सभी राजनैतिक दल दावा कर रहे हैं कि वो राज्य की आवाम के हित में फैसला लेने के लिए प्रतिबद्ध हैं। लेकिन इनके द्वारा लिए गए फैसले लगातार औक्षी राजनीति की और इशारा कर रहे हैं। जी हां, ऐसा हम इसलिए कह रहें क्योंकि कर्नाटक की सियासत ने नया मोड़ ले लिया है।

भाजपा के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह ने कहा है कि राज्य में लिंगायत समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा नहीं दिया जाएगा। भारतीय जनता पार्टी देश की सभी जाति धर्म को एक साथ लेकर चलने में विश्ववास रखती है। इतना ही नहीं शाह ने लिंगायत समुदाय को अल्पसंख्यकों का दर्जा देने वाला फैसला हंदुओं को बाटने वाला बताया। उन्‍होंने कहा कि लिंगायत समुदाय के सभी महंतों का कहना है कि समुदाय को बंटने नहीं देना है उन्हें एक साथ लेकर चलना है। अमित शाह ने वीरशैव लिंगायत के महंतों से कहा, ‘लिंगायत समुदाय को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा देने की राज्‍य सरकार की सिफारिश को केंद्र सरकार नहीं मानेगी।

क्या है लिंगायत मामला:

प्रदेश की मौजूदा सिद्धारमैया सरकार ने सूबे में लिंगायत समुदाय को कमजोर बताते हुए उन्हें अल्पसंख्यकों का दर्जा देने की मांग की है। कांग्रेस के इस फैसले के बाद राज्य में सियासी पारा चड़ गया और और सभी राजनैतिक दल सियासत करते हुए नजर आ रहे हैं। यहां पर गौर करने वाली बात ये हैं कोई भी राजनैतिक पार्टी प्रदेश के विकास की बात नहीं कर रही है। सभी दल वोट बैंक की राजनीति कर रहे हैं। बहराल, अब ये देखना दिलचस्प होगा कि कर्नाटक में किसके सिर पर ताज सजता है और किसे हार का सामना करना पड़ता है।