भारतीय उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को एक ऐसे फेसले पर मुहर लगा दी जिससे बीमार और लाचार लोगों के जीवन के कष्टों को हरा जा सकता है। जी हां सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जो भी बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति अपनी पीड़ा को सहन करने में सक्षम नहीं है, वह अपनी इच्छा म्रत्यु के लिये अदालत से इजाजत ले सकता है। हालांकि ये नियम उन लोगों के ही उपर लागू हो सकेगा जो वाकई बीमारी के चलते पीड़ादायी जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इतना ही नहीं इसके लिए संबधित असपताल से भी अनुमति लेनी होगी। दरअसल अदालत ने ऐसा निर्णय तब लिया जब मुंबई के एक दमपत्ति ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दाखिल की थी कि उनके आगे पीछे अब कोई नहीं हैं और वो अब अपनी इच्छा से अपने प्राणों का त्याग करना चाहते हैं। बहराल अदालत ने ये फैसला तो सुना दिया लेकिन ये लोगों को किस तरह से प्रभावित करेगा इस पर फिलाल कहना बेमानी होगी।

अदालत के इस निर्णय से कहीं न कहीं लोगो की पीड़ा सहन करने की क्षमता मे कमी आएगी, क्योंकि कोई भी व्यक्ति जब व्यापक व्यथा से गुजर रहा होता है तो ऐसी अवस्था में वह बेहद ही कमजोर अवस्था से गुजर रहा होता है, वह अपने जीवन को वीरान महसूस करने लगता है। अब अगर ऐसे में उसके पास इच्छा मृत्यु का विकल्प रहेगा तो वह कमजोर नहीं तो और क्या होगा।

अदालत के इस फैसले की वजह से भारत में मृत्यु दर तेजी से बड़ सकती है। क्योंकि लोग जरा सी परेशानी से थक कर इच्छा मृत्यु की दिशा में सोचना शुरु कर देंगे जो कि इस लोकतंत्र के लिए त्रासदी का सबब बन सकता है। बहराल, जो भी हो अदालत का ये फैसला जनतंत्र की सरआंखो पर। लोग इस फैसले को अलग-अलग नजरिये से देख रहे हैं, कोई इसके फायदे के पहलू को टटोल रहा है तो कोई इससे होने वाली परेशानियों की आहट की टाप को महसूस कर रहा है।